क्या आप मोटापे से जूझ रहे हैं, तो यह अध्ययन आपके लिए उपयोगी साबित हो सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ध्यान से भोजन करना छरहरा होने का राज है। शोधकर्ताओं का कहना है कि भोजन करते समय खुद को भटकाव से दूर करना और पूरा ध्यान खाने पर केंद्रीत करना आपकों छरहरा बनान में मददगार साबित हो सकता है। एक रिपोर्ट के अनुसार इस तरह ध्यान से भोजन करने से मस्तिष्क शरीर के साथ तालमेल बैठा लेता है जिससे वह तृप्त होने के रासायनिक संदेश को सुन पाता है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय में किए गए तथा कई अन्य अध्ययनों में पाया गया कि जो लोग आस-पास हो रही गतिविधियों की बजाय खाने पर ध्यान देते हैं उनका वजन औसतन ६.३ किलोग्राम से ज्यादा कम हो जाता है। वैज्ञानिकों के मुताबिक पाचन तंत्र और तंत्रिका तंत्र के बीच हार्मोन के संकेतों की एक जटिल श्रृंखला है तथा मस्तिष्क तक यह संदेश पहुंचने में करीब २० मिनट लगते हैं कि शरीर ने पर्याप्त भोजन कर लिया है। इसका मतलब है यदि कोई जल्दी जल्दी में भोजन करता है तो संकेत देर से पहुंचेंगे और अधिक भोजन किया जाएगा।
खतरनाक भी हो सकती हैं हरी भरी सब्जियां
बाजार में ताजा सब्जियां देखते ही उसे खरीदने और झट से पकाकर खाने के लिए लालायित रहने वाले लोगों को सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि इन सब्जियों पर इस्तेमाल हुए कीटनाशक, रसायन और इनकी सिंचाई में इस्तेमाल हुए प्रदूषित पानी से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी हो सकती है। राजधानी से गुजरने वाली यमुना नदी पर बने पुलों पर अकसर लोग टोकरियों मे ताजी सब्जियां बेचते दिखाई देते हैं और लोग उन्हें बड़े चाव से खरीदते भी हैं, लेकिन इस तथ्य पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि यमुना के किनारे उगाई जाने वाली इन सब्जियों को जिस पानी से सींचा जाता है, वह बुरी तरह से प्रदूषित होता है। पिछले १० साल से यमुना पर शोध कर रहे पर्यावरणविद, विमलेन्दु झा का कहना है कि यमुना में प्रदूषण का स्तर इतना ज्यादा है कि उसके पानी में जीवन संभव ही नहीं है। राजधानी दिल्ली में यमुना में करीब १७ नाले गिरते हैं जो करीब हर रोज लाखों लीटर गंदा और दूषित पानी यमुना में डालते हैं। इस पानी में घरों में इस्तेमाल होने वाले प्रदूषक जैसे फिनाइल और कीट पतंगों को मारने के लिए इस्तेमाल होने वाला रसायन पौधों के माध्यम से मानव शरीर में बहुत आसानी से पहुंच जाता है और शरीर के तंत्रिका तंत्र पर बहुत खराब असर डालता है। इसके अलावा इसमें सीसा, पारा और कैडमियम जैसे खतरनाक पदार्थ होते हैं, जो जानलेवा साबित हो सकते हैं।
यमुना में प्रदूषण के स्तर का अंदाजा यमुना बचाओ आंदोलन के इस आंकड़े से लगाया जा सकता है, जिसके अनुसार नदी के पानी को नहाने के काबिल बनाने के लिए उसके प्रदूषण स्तर को कम से कम १,००,००० गुना कम करना होगा।
एक गैर सरकारी संस्था 'टॉक्सिक्स लिंक के वरिष्ठ प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर राजीव बेटने का कहना है, ''हमारे देश में सब्जियों में कीटनाशकों का इस्तेमाल उस वक्त से शुरू हो जाता है जब वह बीज की अवस्था में रहते हैं। बीज को खराब होने और कीड़ा लगने से बचाने के लिए, अंकुरण के बाद और फिर उनमें लगी सब्जियों का आकार बढ़ाने के लिए कई तरह के रसायनों का प्रयोग होता है। वह कहते हैं, ''बड़े पैमाने पर सब्जियों की खेती करने वाले किसान लौकी, कद्दू और खीरा का उत्पादन बढ़ाने और उनका आकार बड़ा करने के लिए पौधों में इंजेक्शन के माध्यम से रसायन डालते हैं। इन हार्मोन से फल का आकार तो बढ़ जाता है मगर उससे मानव शरीर को काफी नुकसान पहुंचता है। बेटने कई शोध के हवाले से बताते हैं कि इन रसायनों का मानव तंत्रिका तंत्र पर बहुत खराब असर पड़ता है और उनकी काम करने की गति कम हो जाती है। कुछ रसायनों से कैंसर भी हो सकता है।
सब्जियों, फलों और फसलों में कीटनाशकों के खराब प्रभाव से तो सभी वाकिफ हैं। फिलहाल केरल सहित पूरे देश में कीटनाशक एंडोसल्फान को प्रतिबंधित करने के लिए मुहिम चल रही है। एक गैर सरकारी संस्था के आंकड़ों के अनुसार हमारे देश में इस्तेमाल होने वाले कुछ कीटनाशकों का २० प्रतिशत सब्जियों पर इस्तेमाल होता है। प्रदूषित पानी में उगायी गई सब्जियों और कीटनाशकों से होने वाले नुकसान के बारे में डॉक्टर आर. पी. सिंह का कहना है, ''कीटनाशकों में ऐसे कई रसायन हैं, जिनकी मात्रा पौधों से हमारे शरीर में पहुंचने के बाद १० गुना तक बढ़ जाती है। डीडीटी एक ऐसा ही रसायन है। इससे शरीर में कैल्शियम की कमी होने लगती है और हड्डियां तथादांत कमजोर हो जाते हैं। घरों से निकले गंदे पानी से सिंचित सब्जियों के बारे में वह कहते हैं, ''इन सब्जियों में घरों में इस्तेमाल होने वाले तमात तरह के रसायन मौजूद होते हैं, जिनमें सबसे आम है फिनाइल, जिसे पीने से इन्सान की मौत हो सकती है। यही जानलेवा रसायन इन सब्जियों के जरिए शरीर में पहुंचता है और कई बीमारियों को जन्म देता है। इस बारे में डॉक्टर मुकेश गुप्ता कहते हैं, ''कीटनाशकों से ज्यादा नुकसान फीताकृमि से होता है। सिंचाई के वक्त इस कृमि के अंडे सब्जियों से चिपक जाते हैं और जब हम उन सब्जियों को कच्चा खाते हैं तो ये हमारे पाचन तंत्र की रक्त नलिकाओं के माध्यम से हमारे रक्त प्रवाह में प्रवेश कर जाते हैं। इनका सबसे पहला शिकार हमारा दिमाग होता है। ये हमारे दिमाग में अपने लिए घर बनाते हैं और इल्लियों की तरह विकसित होने लगते हैं। इनके बढऩे पर तमाम दिमागी परेशानियां पैदा होती हैं। कुछ मामलों में तो इल्लियों के कारण लोगों की मौत भी हुयी है।
दूर तक असर करती है फकत दो इंच मुस्कान
कोई चिंता, फिक्र या परेशानी हो तो सब कुछ भुलाकर एक पल आइने के सामने खड़े होकर मुस्कुराइए, तनाव तो कम होगा ही चेहरे की रौनक भी बढ़ जाएगी। चेहरे पर आई हल्की सी मुस्कुराहट में गजब की ताकत होती है और यह बहुत दूर तक असर करती है। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के एक शोध के अनुसार, मुस्कुराहट सिर्फ दिल को सुकून ही नहीं देती, इसका सेहत से भी सीधा संबंध है। मात्र दो इंच की मुस्कुराहट से चेहरे की दर्जनो नसों का व्यायाम हो जाता है। लगातार मुस्कुराते रहिए, इससे चेहरे पर झुर्रियां नहीं पड़तीं और हमेशा रौनक बनी रहती है। मुख्य शोध कर्ता जॉन डाल्टन का यह शोध कहता है कि मुस्कुराने से चेहरे से लेकर गर्दन तक की मांसपेशियों का व्यायाम हो जाता है। मुस्कुराते वक्त चेहरे की सभी मांसपेशियों में खिंचाव आता है, जिससे जल्दी झुर्रियां नहीं पड़तीं। महबूबा की मुस्कुराहट पर कवियों और शायरों ने हजारों लाखों शेर यूं ही नहीं लिख डाले।
आखिर कुछ तो बात है होठों पर खिंची इस नन्हीं सी लकीर में, कि जिसे देखो इसका दीवाना हुआ जाता है। एक अन्य शोध के मुताबिक मुस्कुराकर कही गई बात सामने वाले पर अच्छा प्रभाव डालती है। मुस्कुराकर कहा गया काम हो या फरमाइश, उसके पूरा होने की संभावना ५० प्रतिशत तक बढ़ जाती है। बोस्टन यूनिवर्सिटी के सामाजिक विज्ञान के प्रोफेसर डी। लचर ने इस शोध के लिए १०,००० लोगों को सैंपल सर्वे के जरिए चुना। उनमें से ८५ प्रतिशत का मानना है कि उनके जीवन में कई ऐसे मौके आए जब मुस्कुराकर बात करने से उनका बिगड़ता हुआ काम भी बन गया। बाकी १५ प्रतिशत का मानना है कि मुस्कुराहट बहुत ज्यादा काम नहीं आती। शोध में शामिल लोगों से जब पूछा गया कि अगर कोई उनसे मुस्कुराते हुए किसी काम के लिए कहे तो आपकी प्रतिक्रिया क्या होती है? इसके जवाब में ७५ प्रतिशत लोगों ने कहा कि वह अपने काम नहीं करने के निर्णय पर दोबारा विचार करते हैं तथा ६५ प्रतिशत लोगों ने माना कि वह उस काम को कर देते हैं।
इस शोध की मानें तो इसका मतलब यह हुआ कि अगर किसी को मुस्कुराकर कोई काम करने के लिए कहा जाए तो उसके होने की संभावना ६५ प्रतिशत तक बढ़ जाती है। मुस्कुराहट के सिर्फ यही फायदे नहीं हैं। मुस्कान के बारे में मनोविश्लेषक वंदना प्रकाश कहती हैं, ''अगर आप किसी से पहली बार मिल रहे हैं तो मुस्कुराहट के साथ की गयी बातचीत की शुरूआत माहौल को हल्का बनाती है और आपस में खुल कर बातचीत करने का मौका देती है। वह कहती हैं, ''मुस्कुराहट सिर्फ निजी जीवन में ही बल्कि आपके
कार्यालय में भी बहुत काम आती है। जब आप सुबह मुस्कुराते हुए अपने काम की शुरूआत करते हैं तो काम में आपका मन लगता है और वह जल्दी खत्म भी हो जाता है। साथ ही कार्यालय के साथियों पर भी आपकी मुस्कुराहट का अच्छा प्रभाव पड़ता है। वैसे हर वक्त मुस्कुराना भी ठीक नहीं है। किसी के गम में शरीक होने जाएं या आफिस में कोई काम बिगड़ जाने पर बॉस की डांट खा रहे हों तो मुस्कुराने से परहेज ही करें, वर्ना लेने के देने भी पड़ सकते हैं।
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