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शनिवार, 31 दिसंबर 2011

‘कोलावरी डि‘ की सफलता का राज  

इन दिनों दक्षिण के अभिनेता धनुष के लिखे और गाए गीत कोलावरी डि की प्रचंड लोकप्रियता ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इस गीत में ऐसा क्या है, जो यह लाखों युवा श्रोताओं को लुभा रहा है। न केवल हिंदी सिनेमा बल्कि पश्चिम के किसी साउंडट्रैक ने भी ऐसा रेकार्ड नहीं बनाया, जितना कोलावरी डि ने। अकेले यू ट्यूब पर ही दो करोड़ से ज्यादा लोग इसे सुन चुके हैं। यह हाल तब है जबकि जिस तमिल फिल्म त्री में यह गीत शामिल किया गया है, वह अभी रिलीज भी नहीं हुई।

निश्चित तौर से किसी भी भाषा में गीत रचने वाले साहित्यकारों और गीतकारों के लिए यह दौर अचरज में डालने वाला है। अंग्रेजी शब्दों को जोड़ कर तमिल लहजे में गाए गीत को सुन कर बेशक युवा श्रोता झूम रहे हों, पर हिंदी के गीतकार सिर धुन रहे हैं। खुद प्रतिष्ठित गीतकार जावेद अख्तर ने इसे साधारण धुन में रचा सामान्य गीत बताया है। ट्विटर पर उन्होंने कोलावरी की शब्दरचना को संवेदनशीलता का अपमान बताया है। जावेद साहब की तरह हिंदी सिनेमा के लिए बरसों श्रेष्ठ गीत रच रहे अन्य गीतकार भी यह समझ नहीं पा रहे हैं कि उन्हें इतने श्रोता क्यों नहीं मिले, जितने कोलावरी डि को। जबकि उन्होंने काव्यात्मक ही नहीं सदाबहार गीत भी लिखे और वे सराहे भी गए। लेकिन उन्हें हताश होने की जरूरत नहीं क्योंकि इससे पहले भी जबर्दस्त हिट हुए गीत को समय बीतने के साथ लोग ऐसे भूले कि अब उन्हें याद भी नहीं करते। नब्बे के दशक में स्पेनिश ट्रैक मॅकराना का यही हश्र हुआ।

कोई दो राय नहीं कि मधुर धुनों पर अर्थपूर्ण गीत को श्रोता आज भी पसंद करते हैं। दिल को छू लेने वाले गीत जब भी सुनें सुखद ही लगते हैं। मगर कुछ गीत साधारण धुनों और सामान्य शब्दरचना के साथ अचानक अवतरित होते हैं और धूम मचा देते हैं। हकीकत में ये नर्सरी राइम की तरह होते हैं, जिसमें खासी तुकबंदी होती है और कुछ शब्द कई बार दोहराए जाते हैं। कोलावरी डि इसका उदाहरण है। इसमें अंग्रेजी के हर शब्द के आखिर में ‘यू‘ जोड़ कर तुकांत बनाने की कोशिश की गई है- वाइट स्कीन गर्ल-यू, गर्ल यू, आइज-आइज मीट-यू मीट यू, माई फ्यूचर डार्क यू, वाय दिस कोलावरी कोलावरी कोलावरी डि।

अंग्रेजी और तमिल को मिला कर दक्षिण की नई पीढ़ी के लिए जो तमिलश गढ़ी गई है, वह हमारे यहां की हिंग्लिश की तरह ही है। किसी भी भाषा की खिचड़ी बनाने की जो प्रवृत्ति शुरू हुई है, वह खतरनाक है। क्योंकि जब इस तरह के शब्दों वाली वाक्य रचना पसंद की जाने लगती है, तो वह चलन में आने लगती है। जैसे कि धनुष ने किया है- आइज का आइजु, टीचर का टिअरू या ग्लास का ग्लासू। दुर्भाग्य से कुछ लोग इसे ही यंग जेनरेशन की भाषा कहते हैं। हालांकि कोलावरी की अद्भुत सफलता से अभिभूत लेकिन बेहद विनम्र धनुष का कहना है कि उन्होंने गीत में अंग्रेजी के उन शब्दों का प्रयोग किया है, जो तमिल बोलचाल में अकसर प्रयोग होते हैं।

गीत कोलावरी को जो रेकार्ड सफलता मिली है, उसके पीछे इसकी सहजता और वह लयात्मक टोन है जो युवाओं को अपील कर रही है। कोई कुछ भी कहे, गीत-संगीत में मस्ती तो है ही। बेशक वह कहीं-कहीं पर सुर से भटक गया हो। पिछले दिनों यू ट्यूब पर ही सिमरन नाम की लड़की ठुमकती हुई दिखी तो कोई आश्चर्य नहीं हुआ। दरअसल, न केवल सिमरन बल्कि अन्य बच्चों से लेकर 35 साल तक के युवाओं पर भी कोलावरी का बुखार चढ़ा है। अब तो बच्चे भी यू ट्यूब पर गा रहे हैं। एग्जाम फीवर पर भी कोलावरी डि गाया जा रहा है। गजब का बुखार है सभी पर।

इस गीत को संगीत देने वाले मात्र 18 साल के अनिरुद्ध की तो लाटरी लग गई है। वह अभिनेता धनुष की फिल्म ‘त्री‘ से बतौर संगीतकार अपना कॅरियर शुरू कर रहे हैं। इतनी कम उम्र में उन्हें यह ब्रेक मिला है। सबसे बड़ी बात यह कि इस फिल्म का गीत श्रोताओं में अभी से धूम मचा चुका है। यहां तक कि बॉलीवुड की कुछ हस्तियों ने भी इस गीत की प्रशंसा की है।

मगर जैसे ही इससे बढ़ कर युवाओं को अपील करता कोई गीत रच देगा, श्रोता कोलावरी डि को भूल जाएंगे। इसका हश्र उसी तरह होगा, जैसा का बॉलीवुड के बंपर सांग मुन्नी बदनाम हुई का हुआ। जैसे ही शीला की जवानी आई, लोग मुन्नी को भूलने लगे। अब शीला को भुलाने के लिए चमकी चमेली आ रही है। जाहिर है ये सदबहार गीत नहीं हैं। यों भी सामान्य शब्द रचना वाले ऊटपटांग गीत ज्यादा देर तक जेहन में नहीं रहते। हिट या सुपरहिट भी हो जाएं तो एक दो महीने के बाद अपनी चमक खो देते हैं। मुन्नी-शीला तो गई, चमेली को भी लोग भूलेंगे। श्रोता खुद ही सोंचे कि बरसों बाद लोग अपने दिलों में क्या मुन्नी, शीला या चमेली को दिल में संजो कर रखेंगे? शायद नहीं। तब फिर सोचिए कि किशोर, रफी, मुकेश और लता दीदी के गाने ही क्यों आज भी अच्छे लगते हैं और वे हम सभी के दिलों में क्यों बने हुए हैं?
 जो भी हो धनुष की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने एक-एक शब्द जोड़ कर खुद कर ऑरिजनल गीत-लिखा और उसमें तमिल टच दिया। आज जबकि रीमिक्स का दौर है, ऐसे में एक प्रयोग के साथ किए मौलिकता के लिए धनुष का स्वागत किया जाना चाहिए।

शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

रात बाकी... सुरूर की बात बाकी...

रात बाकी... सुरूर की बात बाकी...

राजस्थान में शराब की दुकानें भले ही 8 बजे बंद हो जाती हों लेकिन शराब का सुरूर कहीं भी कम नजर नहीं आता। अगर कोई शौकीन शराब पीना चाहे तो उसे रात 8 बजे बाद भी निराश नहीं होना पड़ता है। इसका कारण 8 बजे बाद शहर में कई स्थानों पर अंडों के ठेले शराब की दुकानों में तब्दील हो जाते हैं और फिर शुरू हो जाता है इन अस्थाई ठेकों पर मदिरा की मस्ती दौर। इन ठेलों पर चाहे शराब खरीदो या फिर वहीं बैठकर पीओ इसकी पूरी सुविधा मिलती है। कई जगहों पर तो ये गैरकानूनी काम थानों के पास स्थित ठेलों पर भी देखा जा सकता है, लेकिन पुलिसकर्मी जानबूझकर इन्हें रोकने की जहमत नहीं उठाते। शराब माफिया द्वारा कानून की धज्जियां किस प्रकार उड़ाई जा रही है। राज्य में कांग्रेस की सरकार ने अपना शासन आते ही शराब की दुकानों की समय सीमा रात 11 बजे से घटाकर रात 8 बजे कर दी थी, जिसकी वजह से शराब ठेकेदारों में खलबली मच गई थी। कुछ दिनों तक ये ठेकेदार समय सीमा के बाद तक भी दुकानें खोलते हुए नजर आए लेकिन पुलिस की सख्त कार्यवाही के चलते इन्होंने 8 बजे बाद दुकान खोलने के अपने फैसले को बदलकर शराब बेचने का दूसरा तरीका इजाद कर लिया ताकि देर रात तक शराब न बेच पाने के कारण इनको आर्थिक नुक्सान न हो। 
इसी के चलते ये शराब विक्रेता अलग-अलग तरीकों से देर रात तक शराब परोसने के कार्य को अंजाम तक पहुंचा रहे हैं। समय सीमा बढ़ाने की मांग को लेकर कई बार आंदोलनात्मक रूख की धमकी को लेकर भी जब इन्होंने कोई राहत महसूस नहीं की तो अंडे के ठेले लगाने वालों से सांठगांठ कर अपनी बिक्री बढ़ा रहे हैं। ठेले वालों के पास गिलास, प्याज, नमकीन, पानी, सोडा एवं कुर्सियां उपलब्ध रहती हैं। यहां तक कि कच्ची शराब के शौकीन भी यहां से निराश नहीं लौटते। रात को आठ बजे बाद ये जरूर है कि शराब के दामों में बढ़ौतरी  करके दिये जाते हैं पर शराब के शौकीनों के लिये ये बात कहीं भी मायने नहीं रखती। ये एक बोतल पर 50 रूपये ज्यादा देकर अपनी प्यास बुझाते नजर आते हें। अंडे वाले भी इतने सतर्क रहते हैं कि एक बार मांगने पर वे मना कर कह देते हैं कि यहां शराब नहीं मिलती और जब उन्हें यकीन हो जाता है कि ये वास्तव में शराब पीने का शौकीन है पुलिस का मुखबिर नहीं है तो उनको शराब दी जाती है। जो व्यक्ति  ठेलों के इस रहस्य को जानते हैं, वे बेफिक्र होकर देर रात तक शराब खरीदने आते हैं, उन्हें इस बात की बिल्कुल चिंता नहीं रहती कि रात को 8 बाद वे शराब नहीं खरीद पाएंगे। 
इनके अलावा भी शहर में कई जगहों पर अवैध शराब का कारोबार दिन-दूनी, रात-चौगनी तरक्की कर पुलिस प्रशासन की किरकरी करने में अहम भूमिका अदा कर रहा है।

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

786 नोटों का अनोखा संग्रह


786 नोटों का अनोखा संग्रह

व्यवसायी लाला बंग ने जमा किए एक लाख 67 हजार 292 रुपए
लिम्का बुक ऑफ वल्र्ड रिकोर्ड में नाम लिखाने की हसरत


मुस्लिम समाज में 786 अंक का विशेष महत्व है। शाब्दिक रूप में  इसका अर्थ है - शुरु करता हूं अल्लाह के नाम से जो बड़ा रहमान और रहीम है। इसी वजह से खुशी के प्रत्येक कार्य में समाज के लोग इस अंक का उपयोग करते है। इस अंक की वस्तु या सामग्री को एकत्र करने की हॉबी अनेक लोगों में होती है, फिर चाहे वह इस अंक के नोट हो, किसी वस्तु का 786 वां अंक  हो या कोई अन्य वस्तु। किशनगढ़ निवासी व्यवसायी लाला बंग ने भी 786 अंक वाले नोटों का अनुठा संग्रह बनाया है। कई वर्षों से इस अंक के नोटों को एकत्र करने वाले बंग के पास आज एक लाख 67 हजार 292 रुपए है, जिनमें 786 अंक छपा है। बंग की तमन्ना है कि उनका संग्रह इतना बढ़े कि एक दिन लिम्का बुक ऑफ वल्र्ड रिकोर्डस में उनका नाम दर्ज हो जाए। 
किशनगढ़ के अजमेर रोड स्थित बैंक ऑफ बड़ौदा के सामने रहने वाले  40 वर्षीय लाला बंग सेनेट्री आईटम व प्रोपट्री का व्यवसाय करते है। मझेला रोड पर उनका सेनेट्री आईटम का शोरूम है। 'आवाज़ टुडे से बातचीत में व्यवसायी बंग ने अपने इस अनुठे संग्रह के बारे में बताया। बंग ने करीब पन्द्रह साल पहले किसी मैगजीन में एक व्यक्ति के पास 786 अंक वाले नोटों के रूप में  दस-बारह हजार रुपए का संग्रह होने का समाचार देखा था, तभी उनके मन में इस अंक वाले नोटों के संग्रह करने का विचार आया। फिर तो देखते ही देखते उनकी नजर सभी नोटों पर जाने लगी। पूर्व में वे प्राइवेट बस सर्विस का संचालन करते थे, उस दौरान आने वाले सभी नोटों को वे शाम को देखते थे और 786 का अंक वाले नोट को अलग कर देते थे। अनेक बार तो दिन में दो-तीन ऐसे नोट मिल जाते थे जबकि अनेक बार तो दो-तीन हफ्ते तक 786 अंक वाला एक भी नोट नजर नहीं आता था। धीरे-धीरे वे सेनेट्री आईटम व प्रोपर्टी के व्यवसाय में आ गए लेकिन 786 अंक वाले नोटों का संग्रह करने का शौक लगातार जारी रहा। 
आज उनके पास 786 अंक वाले एक लाख 67 हजार 292 रुपए का अनुठा संग्रह है। इनमें एक हजार रुपए के 41 नोट, पांच सौ रुपए के 164 नोट, सौ रुपए के 360 नोट, पचास रुपए के 138 नोट, बीस रुपए के 7 नोट, दस रुपए के 113 नोट, पांच रुपए के 21 नोट, दो रुपए के 8 नोट व एक रुपए का एक नोट शामिल हैं। इस संग्रह में दिनों-दिन बढ़ोत्तरी होती जा रही है। बंग ने बताया कि उनके इस संग्रह को एकत्र करने में उनकी माताजी शांति देवी व पत्नी संगीता बंग ने भी खासा सहयोग दिया है। बंग की तमन्ना है कि उनका संग्रह इतना बढ़े कि लिम्बा बुक ऑफ वल्र्ड रिकोर्डस में उनका नाम दर्ज हो जाए।

दो नोट एक ही अंक वाले :
व्यवसायी लाला बंग के पास दो   नोट ऐसे भी है, जिनमें सारे अंक एक ही है। वह अंक है 777777। इनमें एक नोट पचास रुपए का व दूसरा नोट दस रुपए का हैं।

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डेंटल एक्स रे महिलाओं के लिए घातक
गर्भवती महिला के लिए दांतों का एक्स-रे भी हानिकारक हो सकता है क्योंकि इससे उनके शिशु के कम वजन के होने की संभावना बढ़ जाती है। अभी तक विशेषज्ञ यही मानते हैं कि सिर और गर्दन पर पडऩे वाली रेडिएशन का कोई भी बुरा प्रभाव गर्भवती महिला पर नहीं पड़ता। गर्भाशय में अगर सीधी रेडिएशन पड़े तो गर्भ में पल रहे शिशु पर प्रभाव पड़ सकता है। विशेषज्ञ फिलिप हजुएल ने अपने सात वर्ष तक हुए अध्ययन में पाया कि जिन गर्भवती महिलाओं ने अधिक डैंटल एक्स-रे कराए, उनके शिशुओं में एक्स-रे न करवाने वाली गर्भवती महिलाओं के शिशुओं की तुलना में वजन कम होने की संभावना अधिक पाई गई।
ब्लूबेरी खाकर दिल की बीमारियों को दूर भगाइये
दिल की बीमारियों से छुटकारा पाने चाहते हैं तो रोज ब्लूबेरी खाइये। एक नया अध्ययन तो यही कहता है। ब्लूबेरी को कैंसर और अल्झाइमर से बचाव में बड़ा मददगार माना जाता रहा है। अब शोधकर्ताओं ने दिल की बीमारियों में भी इसके फायदे गिनाए हैं। अमेरिकी कृषि विभाग की अगुआई में शोधकर्ताओं ने पाया कि ब्लूबेरी खाने से दिल का दौरा पडऩे की आशंका कम हो जाती है। उनका कहना है कि ब्लूबेरी धमनियों में कड़ापन नहीं आने देती जो अक्सर दिल के दौरे की वजह होता है। शोधकर्ताओं को चूहों को ब्लूबेरी खिलाकर परीक्षण किया और नतीजों का विश्लेषण किया जिसमें ये तथ्य सामने आया। 
संक्रमण रोकता है शहद
अमेरिका के अनुसंधानकत्र्ताओं ने अपने लम्बे अध्ययन के बाद इस बात का पता लगाया है कि शहद में प्रचुर मात्रा में एंटीबायोटिक तत्व मौजूद होते हैं जो केवल कटी-फटी त्वचा एवं घावों को ही शीघ्र नहीं भरते ,बल्कि किसी भी प्रकार के संक्रमण को रोकने में पूरी तरह सक्षम होते हैं। हाल ही में प्रकाशित 'बीÓ जर्नल के एक अंक के अनुसार इसराईल के अनेक राजकीय और निजी अस्पतालों में घावों, अल्सर आदि की चिकित्सा हेतु शहद का खूब प्रयोग किया जा रहा है।
बहुत अधिक आयरन से पार्किन्सन रोग
आयरन की कम मात्रा का सेवन तो शरीर के लिए हानिकारक है ही, अधिक मात्रा का सेवन भी व्यक्ति को कई रोगों का शिकार बना सकता है। यूनिवर्सिटी ऑफ वाश्ंिागटन की एक रिपोर्ट के अनुसार बहुत अधिक मात्रा में आयरन का सेवन पार्किन्सन रोग की संभावना को बढ़ाता है। अध्ययन में उन्होंने 250 व्यक्तियों को आयरन की भिन्न-भिन्न मात्रा का सेवन कराया और जिन व्यक्तियों ने बहुत अधिक मात्रा में आयरन का सेवन किया उन्हें पार्किन्सन रोग होने की संभावना अधिक पाई गई।
यकृत रोगों को दूर करती हैं खट्टी चेरी
'इंडियन मैडिसिन प्लांट्सÓ नामक पुस्तक के अनुसार चेरी फेफड़ों के रोगों के अतिरिक्त यकृत रोगों में भी लाभदायक है। इसका उपयोग सुजाक, पथरी और वायु नलियों में जीर्ण प्रदाह को दूर करने के लिए भी किया जाता है। चेरी गुर्दे की बीमारी, मितली आदि को भी दूर करती है। सेंधा नमक के साथ काली मिर्च मिलाकर चेरी का सेवन करना चाहिए।
गर्भवती की उल्टियों को रोकता है जामुन का शर्बत
एक वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ के अनुसार अच्छे पके काले-काले जामुन के रस को एक लीटर की मात्रा से लेकर अढ़ाई किलो शक्कर मिलाकर शर्बत बना लें। आग पर चढ़ाकर शर्बत की चाश्नी तैयार की जाती है। इस शर्बत से 15 से 30 मि.लि. तक लेकर पानी में मिलाकर नित्य सेवन करते रहने से खून की संग्रहणी, जी मिचलाना, उल्टियां होना, गले की सूजन,रक्तप्रदर, प्रमेह, उपदंश, पूयमेह आदि रोगों में लाभ होता है। गर्भवती की उल्टियों में यह अचूक औषधि की तरह काम करता है।
स्तन कैंसर से बचाती है हरी मिर्च
यूनिवर्सिटी ऑफ एथेंस, यू.एस. डिपार्टमैंट ऑफ एग्रीकल्चर एवं हार्वर्ड विश्वविद्यालय के शोध वैज्ञानिकों ने स्तन कैंसर से ग्रस्त 2000 महिलाओं पर अध्ययन किया। उनकी भोजन संबंधी आदतों का मुख्य निरीक्षण किया और पाया कि स्तन कैंसर के खतरे को कम करने में 'फ्लावोंसÓ नामक तत्व काफी सहायक साबित होते हैं। फ्लावोंस ब्लेवोनाइड्स समूह का हिस्सा होते हैं। यह आमतौर पर हरी पत्तेदार सब्जियों, लाल या हरी शिमला मिर्च तथा नींबू में मौजूद होते हैं। भोजन में मौजूद 0.5 ग्राम 'फ्लावोंसÓ स्तन कैंसर के खतरे को 13 प्रतिशत तक कम कर देते हैं।
प्रदूषित जल से आंत में फोड़े
जल को जहां जीवन कहा जाता वहीं संक्रमित जल अनेक बीमारियों को पैदा कर देता है। प्रदूषित जल आंखों को संक्रमित कर देता है तथा खूनी पेचिश, टायफाइड, कालरा, डायरिया, पीलिया आदि जैसे अनेक रोगों को भी पनपने का मौका मिलता है। आंत्रशोथ एवं आंत्र कैंसर (वर्ण) भी प्रदूषित जल के पीने से ही होता है। प्रदूषित जल के पीते रहने से जी मिचलाना, पेट का भारी होना, थकावट आदि के लक्षण उभर कर आते हैं। स्वच्छ पानी प्राप्त करने के लिए पानी को उबालना, छानना आदि क्रियाओं को करते रहना हितकर होता है।
स्ट्राबेरी, रसभरी व ब्लैकबेरी स्वास्थ्यप्रद
विशेषज्ञों के अनुसार स्ट्राबेरी, रसभरी व ब्लैकबेरी आदि न केवल स्वाद से भरपूर होती हैं बल्कि इनसे बहुत से स्वास्थ्य लाभ भी मिलते हैं। इन सभी में ऐसे एंटीआक्सीडैंट पाए जाते हैं जो फ्री रैडीकल्स से सुरक्षा देते हैं। रसभरी, स्ट्राबेरी व ब्लैकबेरी में एलाजिक एसिड की अच्छी मात्रा पाई जाती है और विशेषज्ञ इसे 'कैंसर फाइटरÓ के रूप में मानते हैं। कई शोधों से यह पता चला है कि एलाजिक एसिड स्तन, आंत आदि कैंसरों से सुरक्षा देते हैं। विशेषज्ञों ने शोध में पाया कि बेरी और  हरी पत्तेदार सब्जियां डिप्रैशन में भी लाभ पहुंचाती हैं। इस शोध में 3000 पुरुषों व स्त्रियों के ब्लड सैंपल जांच करने पर पाया गया कि डिप्रैशन से पीडि़त व्यक्तियों में फोलेट की कमी पाई गई। बेरी और हरी पत्तेदार सब्जियों में फोलेट की मात्रा भरपूर पाई जाती है जो डिप्रैशन  के रोगियों में पाई जाने वाली इस  कमी को दूर करती है।

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

नए साल पर मचेगी धूम

 नए साल पर मचेगी धूम










देश दुनिया में इन दिनों नए साल के आगमन की तैयारियों की धूम मची है। विशेषकर भारत के सभी राज्यों में नये वर्ष के स्वागत के लिए खास इंतजाम किए गए है। सभी प्रमुख होटलों व रेस्टोरेंटों ने नए साल के स्वागत के लिए अनोखी थीम युक्त पार्टियों का आयोजन रखा है, वहीं अनेक लोगों ने अपने स्तर पर दोस्तों व परिजनों के साथ पार्टी मनाने का फैसला किया है। नया साल कुछ नया लेकर आए तथा नए संकल्प पूरे हो, इसके लिए भी लोगों ने विभिन्न कार्यों की सूचियों को अंतिम रूप देना शुरू कर दिया है। इधर बाजारों ने भी नए साल में लोगों की जेब ढीली करने के लिए कमर कस ली है। इसके तहत अनेक प्रोडक्ट पर विभिन्न स्कीम सेल शुरू की गई है ताकि लोग अधिक से अधिक खरीददारी कर सके। जेसे जेसे नए साल 2012 के नजदीक आने का समय हो रहा है, वेसे वेसे तैयारियां भी अंतिम रूप में पहुंच चुकी है। अब सभी को उस पल का इंतजार है, जब पुराना साल समय के गर्भ में समाएगा और नए साल का उदय होगा। 

भ्रष्टाचार बना मूलमंत्र


भ्रष्टाचार बना सरकार का मूलमंत्र




युवाओं को नहीं रास आ रही खेती




युवाओं को नहीं रास आ रही खेती


आपको मालूम है कि लगातार बढ़ती महंगाई का क्या कारण है? जान लीजिए ! मांग के अनुरूप पैदावार न होना। जी हां पिछले कुछ वर्षो से जिस तरह विकास की आंधी चली है उस गति से कृषि उत्पादन में बढ़ोत्तरी नहीं हुई है। सूखा एवं बाढ़ का प्रकोप कृषि उत्पादन में और कमी कर रहा है। विदित हो कि आजादी के एक दशक बाद ही देश में कृषि उत्पादन की कमी का अहसास होने लगा था। देश को अपनी जरूरत के लिए विदेशों से अनाज का आयात करना पड़ता था। इसी को देखते हुए स्व0 लाल बहादुर शास्त्री ने देश में हरित क्रांति का नारा दिया था। कृषि के लिए तमाम संसाधन जुटाये गये। रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों के संयंत्र लगाये गये सिंचाई के लिए नहरों का जाल बिछाया गया जिसका परिणाम यह हुआ देश कुछ सालों े अन्दर आत्मनिर्भर हो गया।

यही नहीं देश में अनाज की इतनी बम्पर पैदावार होने लगी कि देश अनाज का निर्यात करने की स्थिति में आ गया। आज देश में उन्नीसवीं सदी के छठे एवं सातवें दशक जैसी स्थिति फिर बन गयी है। देश में अनाज का उत्पादन लगातार घट रहा है। कृषि उत्पादन घटने का एक बड़ा कारण यह भी निकल कर आया है कि गांव के युवाओं में खेती के प्रति लगातार अरूचि बढ़ रही है। 

गांव का युवा खेतों के अन्दर अपना जीवन बिताने में विश्वास नहीं रखता है। उसको शहर लुभता है। इसी के चलते रोजाना हजारों युवा गांव छोड़कर शहरों की ओर पलायन कर रहे है।

काश्तकारी का जिम्मा गांव के बड़े बूढ़ों पर निर्भर होकर रह गया है। इसका परिणाम है गांव में आज भी पुरातन पद्धित ही चल रही है। उत्तर प्रदेश में तमाम गांव में हजारों हेक्टेयर भूमि वर्ष भर खाली पड़ी रहती है क्योंकि उस भूमि का मालिक शहरों में बस गया है। युवाओं में खेती के प्रति पनपी अरूचि का कारण स्वाभाविक है क्योंकि किसान परिवार कमरतोड़ मेहनत के बावजूद उतना उत्पादन नहीं कर पाता है जिससे उसकी बुनियादी जरूरतें पूरी हो सके। गांव का युवा यह सिलसिला वर्षो से देख रहा है।


युवा अब यह सब सहने को तैयार नहीं है। अफसोसजनक पहलू यह है कि ग्रामीण युवाओं के लिए शहरों में भी रोजी, रोटी कमाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। शहरों में रोजी रोटी के साथ रिहायशी इलाकों में दुर्गन्धमय वातावरण में रहना पड़ता है जिससे उसके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। दूसरी ओर शहर का वातावरण बढ़ती ग्रामीण आबादी से प्रभावित होता है। आज युवाओं को गांव में रोकना सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। हम उन कारणों से भी वाकिफ है जिसके चलते युवा गांव से पलायन करता है। इसलिए जरूरी है सरकार ऐसी योजनायें तैयार करे जिससे खेती लाभप्रद व्यावसाय में तब्दील हो जाये जिससे युवा खेती के प्रति एक बार फिर से आकृष्ट हो। 

मंगलवार, 27 दिसंबर 2011


अजब-गजब दुनिया




सिनेमाघर

  • दोहा (कतर) में ऐसा पहला सिनेमाघर खुलने वाला है जो केवल महिलाओं के लिए ही होगा। यहां नई फिल्में दिखाई जाएंगी लेकिन 154 सीटों वाले सिनेमाघर में पुरुषों का प्रवेश वर्जित होगा।

शनि ग्रह

  • पिछले दिसंबर से शनि ग्रह पर भीषण तूफान चल रहा है। यह पृथ्वी पर आने वाले तूफानों के मुकाबले 10,000 गुना ज्य्ाादा शक्तिशाली है। तूफान से उस पर बना धब्बा धरती से भी दिखाई दे रहा है।

सबसे महंगा

  • वर्ल्डवाइड कास्ट आफ लिविंग सर्वे के अनुसार जापान की राजधानी टोक्य्ाो दुनिय्ाा का सबसे महंगा स्थान है, जबकि ओस्लो दूसरे, ओसाका कोबे तीसरे, पेरिस चौथे और ज्य्ाूरिख पांचवें नंबर पर है।

सिगरेट

  • अमेरिका में हुए एक अध्य्ाय्ान के अनुसार सिगरेट की लत से छुटकारा पाने के लिए जो लोग दवा का सेवन कर रहे हैं, उन्हें दिल का दौरा पड़ने की आशंका 72 फीसदी बढ़ जाती है।

नमक

  •  मेलबर्न विश्वविद्यालय्ा की शोध टीम ने पाय्ाा है कि नमक भी दिमाग की कोशिकाओं पर उसी तरह असर करता है जैसे मादक पदार्थ करते हैं। नशीले पदार्थों की तरह इसकी भी लत पड़ सकती है।

‘फोल्डेबल‘ विमान

  • कैलिफोर्निय्ाा स्थित आईकॉन कंपनी दो सीट वाला आईकॉन ए 5 विमान पेश करेगी। इस स्पोर्टी विमान के पंखों को पांच मिनट के अंदर पानी य्ाा जमीन पर आसानी से मोड़ा जा सकता है।

मोबाइल फोन

  • ब्रिटेन में एक कैंसर शोध संस्थान के नय्ो अध्य्ाय्ान में य्ाह बात सामने आय्ाी है कि मोबाइल फोन और मस्तिष्क कैंसर में कोई संबंध नहीं हैं। पहले धारणा थी कि इसकी तरंगें कैंसर पैदा कर सकती हैं।

चहलकदमी

  •  कनाडा के वैज्ञानिकों का कहना है कि ऑफिस में पूरा समय्ा कुर्सी पर गुजारने वाले लोग अगर हिलना डुलना, पांव हिलाना और थोड़ी चहलकदमी करते हैं तो उनकी तंदुरूस्ती बढ़ सकती है।

मच्छर

  • फ्रांस में हुए एक शोध के अनुसार मच्छर एल्कोहल का सेवन करने वालों को ज्यादा काटते हैं। वे शराब की       दुर्गंध को पहचानने लगे हैं क्योंकि इसका सेवन कर चुके लोग उन्हें कम भगाते हैं।

sardi ke tevar

उत्तरी भारत में सर्दी ने अपने तेवर दिखा दिए है। जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान, उत्तरप्रदेश व मध्य प्रदेश में सर्दी से जनजीवन अस्तव्यस्थ हो गया है। दिन में जहां सूर्य देवता की नरमी व सर्द हवाएं ठंड को ओर बढाती है तो शाम होते ही ठंडी हवाओं से आमजन जल्दी घर को ओर भागने को मजबूर है। सर्दी के ऐसे ही मौसम में गर्म कपडों व हेलमेट से अपने शरीर का बचाव कर मोटरसाइकिल पर घर जाता युवक।



eye contect

क्रिसमस ki धूम

क्रिसमस का पर्व धूमधाम से मनाया गया, अब नए साल की तेयारी है