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शनिवार, 31 दिसंबर 2011

‘कोलावरी डि‘ की सफलता का राज  

इन दिनों दक्षिण के अभिनेता धनुष के लिखे और गाए गीत कोलावरी डि की प्रचंड लोकप्रियता ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इस गीत में ऐसा क्या है, जो यह लाखों युवा श्रोताओं को लुभा रहा है। न केवल हिंदी सिनेमा बल्कि पश्चिम के किसी साउंडट्रैक ने भी ऐसा रेकार्ड नहीं बनाया, जितना कोलावरी डि ने। अकेले यू ट्यूब पर ही दो करोड़ से ज्यादा लोग इसे सुन चुके हैं। यह हाल तब है जबकि जिस तमिल फिल्म त्री में यह गीत शामिल किया गया है, वह अभी रिलीज भी नहीं हुई।

निश्चित तौर से किसी भी भाषा में गीत रचने वाले साहित्यकारों और गीतकारों के लिए यह दौर अचरज में डालने वाला है। अंग्रेजी शब्दों को जोड़ कर तमिल लहजे में गाए गीत को सुन कर बेशक युवा श्रोता झूम रहे हों, पर हिंदी के गीतकार सिर धुन रहे हैं। खुद प्रतिष्ठित गीतकार जावेद अख्तर ने इसे साधारण धुन में रचा सामान्य गीत बताया है। ट्विटर पर उन्होंने कोलावरी की शब्दरचना को संवेदनशीलता का अपमान बताया है। जावेद साहब की तरह हिंदी सिनेमा के लिए बरसों श्रेष्ठ गीत रच रहे अन्य गीतकार भी यह समझ नहीं पा रहे हैं कि उन्हें इतने श्रोता क्यों नहीं मिले, जितने कोलावरी डि को। जबकि उन्होंने काव्यात्मक ही नहीं सदाबहार गीत भी लिखे और वे सराहे भी गए। लेकिन उन्हें हताश होने की जरूरत नहीं क्योंकि इससे पहले भी जबर्दस्त हिट हुए गीत को समय बीतने के साथ लोग ऐसे भूले कि अब उन्हें याद भी नहीं करते। नब्बे के दशक में स्पेनिश ट्रैक मॅकराना का यही हश्र हुआ।

कोई दो राय नहीं कि मधुर धुनों पर अर्थपूर्ण गीत को श्रोता आज भी पसंद करते हैं। दिल को छू लेने वाले गीत जब भी सुनें सुखद ही लगते हैं। मगर कुछ गीत साधारण धुनों और सामान्य शब्दरचना के साथ अचानक अवतरित होते हैं और धूम मचा देते हैं। हकीकत में ये नर्सरी राइम की तरह होते हैं, जिसमें खासी तुकबंदी होती है और कुछ शब्द कई बार दोहराए जाते हैं। कोलावरी डि इसका उदाहरण है। इसमें अंग्रेजी के हर शब्द के आखिर में ‘यू‘ जोड़ कर तुकांत बनाने की कोशिश की गई है- वाइट स्कीन गर्ल-यू, गर्ल यू, आइज-आइज मीट-यू मीट यू, माई फ्यूचर डार्क यू, वाय दिस कोलावरी कोलावरी कोलावरी डि।

अंग्रेजी और तमिल को मिला कर दक्षिण की नई पीढ़ी के लिए जो तमिलश गढ़ी गई है, वह हमारे यहां की हिंग्लिश की तरह ही है। किसी भी भाषा की खिचड़ी बनाने की जो प्रवृत्ति शुरू हुई है, वह खतरनाक है। क्योंकि जब इस तरह के शब्दों वाली वाक्य रचना पसंद की जाने लगती है, तो वह चलन में आने लगती है। जैसे कि धनुष ने किया है- आइज का आइजु, टीचर का टिअरू या ग्लास का ग्लासू। दुर्भाग्य से कुछ लोग इसे ही यंग जेनरेशन की भाषा कहते हैं। हालांकि कोलावरी की अद्भुत सफलता से अभिभूत लेकिन बेहद विनम्र धनुष का कहना है कि उन्होंने गीत में अंग्रेजी के उन शब्दों का प्रयोग किया है, जो तमिल बोलचाल में अकसर प्रयोग होते हैं।

गीत कोलावरी को जो रेकार्ड सफलता मिली है, उसके पीछे इसकी सहजता और वह लयात्मक टोन है जो युवाओं को अपील कर रही है। कोई कुछ भी कहे, गीत-संगीत में मस्ती तो है ही। बेशक वह कहीं-कहीं पर सुर से भटक गया हो। पिछले दिनों यू ट्यूब पर ही सिमरन नाम की लड़की ठुमकती हुई दिखी तो कोई आश्चर्य नहीं हुआ। दरअसल, न केवल सिमरन बल्कि अन्य बच्चों से लेकर 35 साल तक के युवाओं पर भी कोलावरी का बुखार चढ़ा है। अब तो बच्चे भी यू ट्यूब पर गा रहे हैं। एग्जाम फीवर पर भी कोलावरी डि गाया जा रहा है। गजब का बुखार है सभी पर।

इस गीत को संगीत देने वाले मात्र 18 साल के अनिरुद्ध की तो लाटरी लग गई है। वह अभिनेता धनुष की फिल्म ‘त्री‘ से बतौर संगीतकार अपना कॅरियर शुरू कर रहे हैं। इतनी कम उम्र में उन्हें यह ब्रेक मिला है। सबसे बड़ी बात यह कि इस फिल्म का गीत श्रोताओं में अभी से धूम मचा चुका है। यहां तक कि बॉलीवुड की कुछ हस्तियों ने भी इस गीत की प्रशंसा की है।

मगर जैसे ही इससे बढ़ कर युवाओं को अपील करता कोई गीत रच देगा, श्रोता कोलावरी डि को भूल जाएंगे। इसका हश्र उसी तरह होगा, जैसा का बॉलीवुड के बंपर सांग मुन्नी बदनाम हुई का हुआ। जैसे ही शीला की जवानी आई, लोग मुन्नी को भूलने लगे। अब शीला को भुलाने के लिए चमकी चमेली आ रही है। जाहिर है ये सदबहार गीत नहीं हैं। यों भी सामान्य शब्द रचना वाले ऊटपटांग गीत ज्यादा देर तक जेहन में नहीं रहते। हिट या सुपरहिट भी हो जाएं तो एक दो महीने के बाद अपनी चमक खो देते हैं। मुन्नी-शीला तो गई, चमेली को भी लोग भूलेंगे। श्रोता खुद ही सोंचे कि बरसों बाद लोग अपने दिलों में क्या मुन्नी, शीला या चमेली को दिल में संजो कर रखेंगे? शायद नहीं। तब फिर सोचिए कि किशोर, रफी, मुकेश और लता दीदी के गाने ही क्यों आज भी अच्छे लगते हैं और वे हम सभी के दिलों में क्यों बने हुए हैं?
 जो भी हो धनुष की तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने एक-एक शब्द जोड़ कर खुद कर ऑरिजनल गीत-लिखा और उसमें तमिल टच दिया। आज जबकि रीमिक्स का दौर है, ऐसे में एक प्रयोग के साथ किए मौलिकता के लिए धनुष का स्वागत किया जाना चाहिए।

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