हिन्दुस्तान की आजादी में अंग्रेजों से लोहा लेने वाली खादी संस्कृति के लिए विख्यात गांधीजी का चरखा क्या इतना छोटा भी बनाया जा सकता है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते ? जी हां, ये सच है विश्व का सबसे छोटा चरखा अजमेर में है। जिसने लिम्का बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड में अपना नाम दर्ज करा रखा है।
स्थानीय रामगंज निवासी मधुकान्त वत्स ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन से प्रेरणा ले उस कल्पना को साकार किया जिसकी वजह से विश्व में क्रान्ति पैदा हुई और परिवर्तन हुआ। और वह है शक्तिशाली चरखा। इस बात से प्रेरित हो वत्स ने उस बड़े चरखे का हुबहु छोटा रुप तैयार कर रेकार्ड कायम किया। विश्व के इस सबसे छोटे चरखे की खास बात यह है कि वह कुल 13 ग्राम वजन का है तथा लम्बाई में पांच रुपये के नोट तथा चौड़ाई में उससे भी छोटा है। चरखे की लम्बाई 11.9 से.मी., ऊंचाई 5.2 से.मी. तथा चौड़ाई 6.3 से.मी. है।
बरबस अपनी ओर आकर्षित करता यह चरखा लकड़ी, बुश, स्पेण्डल तथा हैण्डिल के जरिये हाथों से तैयार किया गया है। हस्तनिर्मित इस चरखे के निर्माण में 6 से 7 माह की दृढ़ इच्छाशक्ति, कड़ी मेहनत और काम के प्रति लगन है। इस चरखे पर विधिवत् कपास के जरिये सूत काता जा सकता है। वत्स ने हमारे प्रतिनिधि के सामने सूत कात कर दिखाया। वत्स की पीड़ा है कि सरकार की ओर से कभी कोई प्रोत्साहन नहीं मिला।
छोटा किन्तु शक्तिशाली प्रेरणा का द्योतक यह छोटा 'चरखा अब गिनिज बुक ऑफ वल्र्ड रेकार्ड के लिए भेजा जायेगा। श्री वत्स के पास लिम्का बुक ऑफ वल्र्ड रेकार्ड के एडिटर विजय घोष का हस्ताक्षरयुक्त प्रमाण पत्र मौजूद है।
गांधी जी को था लगाव
चरखा भारतीय ग्रामीण परिवेश की रीढ़ माना जाता था। यही कारण रहा कि महात्मा गांधी जी को चरखा व खादी से विशेष लगाव था। वे इसी चरखे के दम पर भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना चाहते थे। इसी कारण गांधी जी ने अपने आंदोलनों में चरखे की महत्ता पर प्रकाश डाला तथा सभी को चरखे से बने कपड़े का उपयोग करने की सलाह दी। लोगों ने इस सलाह को बखूबी माना।
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